वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जगदाळे और टीम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत! मजीठिया मामलों को मिलेगी रफ्तार, हाईकोर्ट के तकनीकी झटके को दरकिनार कर ‘अनुच्छेद 142’ के तहत ऐतिहासिक निर्देश!!
...वरना कर्मचारियों को नए सिरे से लड़नी पड़ती लड़ाई; लेबर कोर्ट के अवॉर्ड को सीधे रद्द न करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निकाला बीच का रास्ता!

वर्किंग जर्नलिस्ट्स मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला; हाईकोर्ट के तकनीकी झटके को दरकिनार कर ‘अनुच्छेद 142’ के तहत दिए बड़े निर्देश!
…वरना कर्मचारियों को नए सिरे से लड़नी पड़ती लड़ाई; लेबर कोर्ट के अवॉर्ड को सीधे रद्द न करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निकाला बीच का रास्ता!
नई दिल्ली (सुधीर भास्कर जगदाले) :
श्रमिक पत्रकारों (Working Journalists) के अधिकारों की लड़ाई में आज सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण कानूनी राहत प्रदान की है। महाराष्ट्र सरकार के २०१४ के नोटिफिकेशन में मौजूद तकनीकी त्रुटि के कारण लेबर कोर्ट द्वारा दिए गए फैसलों (Awards) को अवैध घोषित करने के हाईकोर्ट के फैसले को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए भी, सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित कर्मचारियों का बड़ा नुकसान रोकने के लिए अपने विशेषाधिकार (Article 142) का इस्तेमाल किया है। सुप्रीम कोर्ट ने ओपन कोर्ट में टिप्पणी करते हुए कहा, “यदि हम हाईकोर्ट के केवल तकनीकी मुद्दे पर मुहर लगाकर लेबर कोर्ट के फैसलों को पूरी तरह रद्द कर देते, तो कर्मचारियों के साथ बड़ा अन्याय होता।” कोर्ट ने राज्य सरकार को अगले ६ महीनों के भीतर सभी मामलों की नए सिरे से समीक्षा कर ‘वैध रेफरेंस’ (Valid Reference) जारी करने का निर्देश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह ऐतिहासिक फैसला वरिष्ठ पत्रकार सुधीर भास्कर जगदाले और अन्य बनाम डी. बी. कॉर्प (दैनिक दिव्य मराठी, दैनिक भास्कर) के मामले में सुनाया है।
विशेष बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश आज खुली अदालत (Open Court) में पढ़कर सुनाया है। आदेश पर अंतिम हस्ताक्षर करने से पहले कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों को निर्देशों को देखने और यदि कोई आवश्यक संशोधन हो, तो उसे सुझाने का अवसर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की खुली अदालत में आज क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीशों ने अपने फैसले के दो मुख्य पहलुओं को रेखांकित किया:
- पहला भाग (धारा 17(2) और अधिकार क्षेत्र): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट’ की धारा १७(२) की व्याख्या इस तरह नहीं की जा सकती कि राज्य सरकार को अपने अधिकार किसी अन्य प्राधिकारी (जैसे श्रम आयुक्त) को ‘डेलीगेट’ (Delegation of Power) करने की अनुमति मिल जाए। हाईकोर्ट का यह तकनीकी बिंदु सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी रूप से सही माना है।
- दूसरा भाग (2025 के लेबर कोड का संदर्भ): कोर्ट ने यह भी संज्ञान में लिया कि पुराना वर्किंग जर्नलिस्ट कानून अब व्यावहारिक रूप से लागू नहीं है, क्योंकि वर्ष २०२५ से देश में नया ‘लेबर कोड’ प्रभावी हो चुका है। ऐसी स्थिति में यदि लेबर कोर्ट के पुराने फैसलों को सीधे रद्द कर दिया जाता, तो सभी प्रक्रियाएं नए कोड के तहत बिल्कुल शून्य से शुरू करनी पड़तीं। इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद १४२ (Article 142) के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग किया।
सुप्रीम कोर्ट के 5 बड़े और महत्वपूर्ण निर्देश:
१. ६ महीने के लिए ‘जैसे थे’ (Status Quo) स्थिति:
लेबर कोर्ट या हाईकोर्ट में जो भी मामले या कार्यवाही जिस भी चरण में लंबित हैं, वे अगले ६ महीनों के लिए ‘जैसे थे’ (Pending) बने रहेंगे। कोई भी कार्यवाही तकनीकी आधार पर खारिज नहीं होगी।
२. राज्य सरकार हर मामले की स्वयं करेगी समीक्षा:
इस ६ महीने की अवधि के दौरान, महाराष्ट्र सरकार को ऐसे प्रत्येक मामले की व्यक्तिगत रूप से समीक्षा करनी होगी जहां श्रम आयुक्त के माध्यम से रेफरेंस (संदर्भ) दिया गया था। राज्य सरकार को स्वयं संतुष्ट (Satisfaction) होना होगा कि वास्तव में वहां कोई औद्योगिक विवाद मौजूद है जिसे लेबर कोर्ट भेजा जाना चाहिए।
३. सरकार पुनः वैध ‘रेफरेंस’ जारी करेगी:
संतुष्टि होने के बाद, राज्य सरकार अपने स्वयं के अधिकार क्षेत्र से लेबर कोर्ट या हाईकोर्ट को उस लंबित मामले का ‘अग्रिम संदर्भ’ (Further Reference) आधिकारिक तौर पर भेजेगी। इससे हाईकोर्ट द्वारा उठाए गए अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) का विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।
४. नए साक्ष्य (Fresh Evidence) प्रस्तुत करने की अनुमति:
यदि लेबर कोर्ट में कार्यवाही लंबित है और कोई भी पक्ष (कर्मचारी या प्रबंधन) नए साक्ष्य प्रस्तुत करना चाहता है, तो सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को नए सबूत रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति दी है।
५. विवाद खारिज होने पर कर्मचारियों को वसूली (Recovery) का अधिकार:
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि किसी मामले में राज्य सरकार यह निर्णय लेती है कि “यह विवाद रेफरेंस देने योग्य नहीं है”, तो सरकार को इसकी लिखित सूचना संबंधित कर्मचारी को देनी होगी। ऐसी सूचना मिलने के बाद, उस कर्मचारी को कानून के अनुसार सीधे ‘रिकवरी’ (वसूली) की कार्यवाही शुरू करने की पूरी स्वतंत्रता होगी। इस स्थिति में, लिमिटेशन पीरियड (Limitation Period) उस तारीख से गिना जाएगा जिस दिन कर्मचारी को सरकार से सूचना प्राप्त होगी, ताकि उसका कानूनी अधिकार प्रभावित न हो।
न्यायाधीशों ने आदेश पर अभी हस्ताक्षर क्यों नहीं किए?
आदेश का विवरण साझा करते हुए न्यायाधीशों ने दोनों पक्षों के वकीलों से कहा, “हम इस आदेश पर अभी हस्ताक्षर नहीं कर रहे हैं। दोनों पक्ष इन निर्देशों को ध्यान से देख लें। यदि किसी को लगता है कि इसमें कोई ऐसी कमी रह गई है जिससे आगे की कार्यवाही में बाधा आ सकती है, या कोई बिंदु जोड़ना है, तो हमें बताएं। हम उसे अंतिम आदेश में शामिल कर लेंगे।” सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से कामगार पत्रकारों को न्याय मिलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
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