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दिव्य मराठी को करारा झटका, वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जगदाले टीम की सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक जीत! १० साल की लड़ाई ‘जीरो’ करने का दिव्य मराठी का गेम प्लान फेल; हाई कोर्ट द्वारा खारिज लेबर कोर्ट का आदेश सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जीवित!

संविधान का 'अनुच्छेद १४२' (Article 142) बना 'ब्रह्मास्त्र'; देश भर के पत्रकारों के उच्च न्यायालय और लेबर कोर्ट में फंसे मामलों को मिलेगी गति।

सुधीर भास्कर जगदाले (9923355999)
नई दिल्ली (११ अगस्त २०२६):
मजीठिया वेतन आयोग (Majithia Wage Board) के हक की बकाया राशि के लिए पिछले १० वर्षों से अविरत संघर्ष कर रहे श्रमिक पत्रकारों का गला घोंटने के ‘दैनिक दिव्य मराठी’ प्रबंधन के तकनीकी मंसूबे को सर्वोच्च न्यायालय ने पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ के डबल बेंच के आदेश का हवाला देते हुए औरंगाबाद उच्च न्यायालय ने तकनीकी त्रुटि पर उंगली उठाते हुए पत्रकारों के पक्ष में आए फैसले को सीधे खारिज कर दिया था। उस अन्यायपूर्ण आदेश को दरकिनार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जगदाळे और उनके सहयोगियों के मामले को संविधान के अनुच्छेद १४२ (Article 142) के तहत प्राप्त सर्वोच्च विशेषाधिकार का उपयोग करके जीवित कर दिया है।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने प्रबंधन की तकनीकी पतलून को कानूनी दायरे में ही रोकते हुए तीखा प्रहार किया कि, “केवल प्रशासनिक ढांचे की गलती के कारण वर्षों से लड़ने वाले गरीब श्रमिक पत्रकारों को फिर से ‘शून्य’ (Zero) से लड़ने के लिए मजबूर करना घोर अन्यायपूर्ण होगा।” इस टिप्पणी के साथ न्यायालय ने श्रमिक पत्रकारों की १० वर्षों की कानूनी लड़ाई को ऐतिहासिक संजीवनी दी है।

सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले से प्रभावित पत्रकारों को बड़ी राहत मिली है और तकनीकी कारणों से उनके मामले पूरी तरह से रद्द नहीं होंगे, जिसके कारण उन्हें अब फिर से शून्य से न्यायिक लड़ाई लड़ने की आवश्यकता नहीं होगी।


दैनिक भास्कर संचालित दिव्य मराठी को करारा झटका! तकनीकी कारणों से रद्द हुआ ‘अवार्ड’ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जीवित!

दैनिक भास्कर समूह के ‘दिव्य मराठी’ प्रबंधन को सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से बड़ा कानूनी झटका लगा है। वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जगदाले और उनके सहयोगियों के पक्ष में औरंगाबाद के श्रम न्यायालय (Labour Court) ने बकाया राशि मंजूर करने का अंतिम ‘अवार्ड’ पारित किया था। इसके खिलाफ डीबी कॉर्प लिमिटेड ने औरंगाबाद हाई कोर्ट में रिट याचिकाएं दायर की थीं। हाई कोर्ट ने एक ‘तकनीकी मुद्दे’ (कि श्रम उपायुक्त को यह संदर्भ लेबर कोर्ट भेजने का कानूनी अधिकार नहीं था) का आधार लेकर लेबर कोर्ट के उस आदेश को सीधे खारिज कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने औरंगाबाद हाई कोर्ट के उस खारिज करने वाले आदेश को दरकिनार कर दिया है और पत्रकारों को उच्च न्यायालय में जाकर उस पुराने आदेश को रिकॉल (Recall) करने और अपने मामले को ‘जीवित’ करने की पूरी छूट दी है। इसके चलते प्रबंधन का तकनीकी रास्ता अब पूरी तरह से बंद हो गया है।


१० साल की लड़ाई ‘जीरो’ करने के दिव्य मराठी के मंसूबे पर फिरा पानी! तकनीकी पेंच का आधार लेकर श्रमिकों को सड़क पर लाने का प्रयास सर्वोच्च न्यायालय ने किया नाकाम!

दैनिक भास्कर संचालित ‘दिव्य मराठी’ प्रबंधन ने श्रमिक पत्रकारों की पिछले १० वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई को केवल एक तकनीकी त्रुटि का आधार लेकर पूरी तरह से समाप्त करने (Zero करने) का पुख्ता मंसूबा रचा था। हाई कोर्ट के आदेश के बाद प्रबंधन का यह उद्देश्य लगभग सफल हो गया था; क्योंकि यदि लेबर कोर्ट के फैसले सीधे रद्द हो जाते, तो पत्रकारों को नए ‘लेबर कोड २०२५’ के अनुसार फिर से शून्य से पूरी प्रक्रिया शुरू करनी पड़ती, जो श्रमिकों के साथ घोर अन्याय होता।
लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने प्रबंधन की इस चाल को पहचान लिया और अपने आदेश के अनुच्छेद ३३, ३७ और ३८ में स्पष्ट किया कि तकनीकी निर्णय के कारण श्रमिकों के मामलों का अंत (Termination) नहीं होगा और चल रही प्रक्रियाएं बंद नहीं की जाएंगी। न्यायालय ने अनुच्छेद १४२ के तहत मिली शक्ति से रुकी हुई प्रक्रिया को सुरक्षित कर दिया और ६ महीने के लिए ‘यथास्थिति’ (Status Quo) रखते हुए राज्य सरकार को ‘वैध संदर्भ’ देने की जिम्मेदारी सौंपी है।


वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जगदाले को अब आगे क्या करना होगा? लड़ाई ‘शून्य’ से नहीं; जहां हाई कोर्ट ने रोकी थी, वहीं से सीधे आगे बढ़ेगी!

सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक आदेश के अनुसार, मुख्य याचिकाकर्ता वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जगदाले और उनकी टीम को अपनी न्यायिक लड़ाई फिर से ‘शून्य’ (Zero) से शुरू करने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। औरंगाबाद उच्च न्यायालय ने तकनीकी कारणों से जिस चरण पर उनका मामला खारिज किया था, ठीक उसी चरण से यह मामला फिर से जीवित हो जाएगा। उन्हें निम्नलिखित कानूनी कदम क्रमानुसार (Sequence) उठाने होंगे:
    • १. राज्य सरकार के पास पुनर्विचार का आवेदन जमा करना (तत्काल कदम): सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार, वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जगदाले को सबसे पहले महाराष्ट्र सरकार के श्रम विभाग (मंत्रालय/श्रम आयुक्त कार्यालय) में एक आधिकारिक लिखित आवेदन जमा करना होगा। इस आवेदन के माध्यम से, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई ६ महीने की समय-सीमा के भीतर, उनके पुराने मामले के सभी दस्तावेजों की नए सिरे से जांच कर राज्य सरकार को अपने हस्ताक्षर से ‘वैध नया संदर्भ’ (Valid Fresh Reference) श्रम न्यायालय या उच्च न्यायालय के समक्ष जारी करने का कानूनी अनुरोध करना होगा।
    • २. औरंगाबाद उच्च न्यायालय में ‘रिस्टोरेशन’ (पुनर्स्थापना) आवेदन दायर करना: राज्य सरकार से मूल संदर्भ की जांच पूरी होने और सरकार का ‘नया संतोष’ (Fresh Satisfaction) रिकॉर्ड पर आने के बाद, सुधीर जगदाले को मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ का रुख करना होगा। वहां औरंगाबाद हाई कोर्ट के पुराने खारिज करने वाले आदेश को रद्द करने के लिए ‘रिकॉल’ (Recall) और अपने मूल मामले को पूर्ववत करने के लिए ‘रिस्टोरेशन’ (Restoration) आवेदन दायर करना होगा। सर्वोच्च न्यायालय के परिच्छेद ४० के निर्देशानुसार, उच्च न्यायालय उस मामले को तत्काल बहाल कर गुण-दोष (Merits) पर अंतिम निर्णय देगा।
    • ३. चूंकि श्रम न्यायालय पहले ही सुधीर जगदाले के पक्ष में फैसला दे चुका है, इसलिए आगे का रास्ता साफ है और हाई कोर्ट में जमा एरियर्स की राशि को भी निकालने (Withdraw) का मार्ग अब प्रशस्त हो गया है।


संविधान का ‘अनुच्छेद १४२’ (Article 142) क्या है? जिसके एक ही इस्तेमाल से सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया हाई कोर्ट का फैसला!

कानून के तकनीकी दायरे में जब श्रमिकों का गला घोंटा जाता है, तब सर्वोच्च न्यायालय इस ‘ब्रह्मास्त्र’ का उपयोग करता है!
इस पूरे मामले में ‘अनुच्छेद १४२’ (Article 142) शब्द सबसे महत्वपूर्ण रहा है। सामान्य पाठकों के लिए सर्वोच्च न्यायालय के इस ‘ब्रह्मास्त्र’ को समझना बेहद दिलचस्प है:
    • असीमित और विशेष अधिकार: भारतीय संविधान का अनुच्छेद १४२ सर्वोच्च न्यायालय को मिला एक ऐसा विशेष अधिकार है, जिसका उपयोग करके न्यायालय कानून के तकनीकी दायरे से परे जाकर ‘पूर्ण न्याय’ (Complete Justice) कर सकता है।
    • तकनीकी पर न्याय की जीत: औरंगाबाद हाई कोर्ट ने “सरकार ने अधिकार गलत तरीके से सौंपे (Delegate किए)” इस तकनीकी मुद्दे को पकड़कर पत्रकारों का मामला खारिज किया था। कानूनी भाषा में हाई कोर्ट का वह तकनीकी बिंदु भले ही सही था, लेकिन व्यवहार में इसके कारण १० साल से लड़ रहे पत्रकारों पर भारी अन्याय हो रहा था।
    • श्रमिकों के लिए ‘सुरक्षा कवच’: यदि सर्वोच्च न्यायालय ने केवल कानून की सूखी भाषा देखी होती, तो पत्रकारों की लड़ाई शून्य हो जाती। लेकिन, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू ने स्पष्ट किया कि तकनीकी गलतियों की सजा गरीब श्रमिक पत्रकारों को नहीं मिल सकती। इसीलिए उन्होंने अनुच्छेद १४२ का उपयोग किया; जिससे हाई कोर्ट का तकनीकी आक्षेप भी बना रहा और श्रमिकों की १० साल की लड़ाई को ‘सुरक्षा कवच’ मिलकर उनके मामले भी जीवित रहे।


⚖️ सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय पत्र में क्या कहा है, विस्तार से पढ़ें (परिच्छेदानुसार)

परिच्छेद १:
विशेष अनुमति (Special Leave) मंजूर की जाती है。

परिच्छेद २:
ये अपीलें मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ और नागपुर पीठ द्वारा दिए गए अलग-अलग निर्णयों के खिलाफ दायर की गई हैं। इन सभी मामलों में कानून का एक ही समान प्रश्न (Common Question of Law) शामिल होने के कारण, हम इस संयुक्त निर्णय और आदेश द्वारा इन सभी का निपटारा करने का प्रस्ताव करते हैं。

परिच्छेद ३:
उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ के एकल न्यायाधीश (Single Judge) ने श्रम न्यायालय (Labour Court), औरंगाबाद के ४ जनवरी २०१९ के एक आदेश (Award) को चुनौती देने वाली नियोक्ता-दैनिक भास्कर (जो हमारे समक्ष प्रतिवादी हैं) की १६ (सोलह) रिट याचिकाएं मंजूर करते हुए उस आदेश को दरकिनार कर दिया था। नागपुर पीठ ने एक अलग रिट याचिका में जो निर्णय दिया था, उससे औरंगाबाद के एकल न्यायाधीश बाध्य थे। नागपुर की उस खंडपीठ (Division Bench) ने नियोक्ता-ऑल इंडिया रिपोर्टर प्राइवेट लिमिटेड द्वारा उठाई गई प्रारंभिक आपत्ति (Preliminary Objection) को स्वीकार किया था और अतिरिक्त श्रम आयुक्त (Additional Commissioner of Labour) द्वारा चौथे श्रम न्यायालय, नागपुर को भेजे गए संदर्भ (Reference) को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया था。

परिच्छेद ४:
‘वर्किंग जर्नलिस्ट्स एंड अदर न्यूजपेपर एम्प्लॉईज (कंडीशन्स ऑफ सर्विस) एंड मिसलेनियस प्रोविजन्स एक्ट, १९५५’ (श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा जारी २१ नवंबर २०२५ की अधिसूचना द्वारा यह कानून अब ‘ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन्स कोड, २०२०’ द्वारा निरस्त कर दिया गया है) की धारा १७(२) के तहत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, महाराष्ट्र सरकार के उद्योग, ऊर्जा और श्रम विभाग ने ११ मई २०१६ की अधिसूचना द्वारा विवाद को श्रम न्यायालय में भेजने (Refer करने) का अपना अधिकार अपने अधीनस्थ अधिकारियों (अर्थात अतिरिक्त श्रम आयुक्त और उप श्रम आयुक्त) को सौंप दिया था।

परिच्छेद ५:
उच्च न्यायालय के समक्ष (और अब इस न्यायालय के समक्ष भी) मुख्य केंद्रीय प्रश्न यही था कि, ‘वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट’ की धारा १७(२) राज्य सरकार को ऐसा अधिकार देती है क्या, जिसके द्वारा सरकार कर्मचारी की बकाया राशि के विवाद का संदर्भ श्रम न्यायालय को भेजने का अपना मुख्य अधिकार किसी अन्य प्राधिकरण को सौंप (Delegate कर) सकती है?

परिच्छेद ६:
नोट करने वाली बात यह है कि उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ के २२ दिसंबर २०२२ के निर्णय को कर्मचारी सुधीर और अन्य कर्मचारियों ने मुख्य अपील के माध्यम से चुनौती दी है। सुधीर और अन्य ने नागपुर पीठ के १७ नवंबर २०२२ के निर्णय को पहली जुड़ी हुई अपील में चुनौती दी है। दूसरी जुड़ी हुई अपील महाराष्ट्र के पत्रकारों के संघ ने औरंगाबाद पीठ के निर्णय के खिलाफ की है। नागपुर पीठ के निर्णय को तीसरी जुड़ी हुई अपील में ‘ऑल इंडिया रिपोर्टर’ के कर्मचारी संघ ने चुनौती दी है।

परिच्छेद ७:
इस चरण पर ‘वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट’ की धारा १७ को ज्यों का त्यों उद्धृत करना उचित होगा, जो इस प्रकार है:
“१७. नियोक्ता से बकाया राशि की वसूली। – (१) जब इस अधिनियम के तहत किसी समाचार पत्र कर्मचारी की कोई राशि नियोक्ता के पास बकाया हो, तब वह कर्मचारी स्वयं, या उसके द्वारा लिखित रूप में अधिकृत कोई भी व्यक्ति, या कर्मचारी की मृत्यु हो जाने पर उसके परिवार का कोई भी सदस्य, अन्य वसूली के मार्गों को प्रभावित किए बिना, बकाया वसूली के लिए राज्य सरकार को आवेदन कर सकता है। यदि राज्य सरकार या राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में निर्दिष्ट प्राधिकरण संतुष्ट हो जाता है कि राशि देय है, तो वे उस राशि का प्रमाण पत्र कलेक्टर (Collector) को जारी करेंगे और कलेक्टर भू-राजस्व की बकाया (Arrear of Land Revenue) की तरह उस राशि की वसूली करेंगे।
(२) यदि समाचार पत्र कर्मचारी की बकाया राशि के संबंध में नियोक्ता और कर्मचारी के बीच कोई प्रश्न या विवाद उत्पन्न होता है, तो राज्य सरकार स्वयं या आवेदन प्राप्त होने पर उस प्रश्न को ‘इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, १९४७’ के तहत स्थापित किसी भी श्रम न्यायालय (Labour Court) को निर्णय के लिए संदर्भित (Refer) कर सकती है।
(३) श्रम न्यायालय अपना निर्णय बकाया का संदर्भ भेजने वाली राज्य सरकार को सौंपेगा और लेबर कोर्ट द्वारा तय की गई राशि धारा १७(१) में दी गई पद्धति से ही वसूल की जाएगी।”

परिच्छेद ८:
हम अपने इस निर्णय के दौरान धारा १७(२) की आवश्यकताओं और उसमें निहित मौन (Silence) का विस्तृत विश्लेषण करेंगे। इन अपीलों के निर्णय के लिए धारा १७(२) का मुख्य मूल तत्व विवाद को श्रम न्यायालय में भेजने का अधिकार है। संदर्भ (Referral) के अधिकार की यह व्याख्या नियोक्ता और कर्मचारी दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी पर श्रम न्यायालय द्वारा दिए गए आदेशों की अंतिम वैधता निर्भर करती है। यदि मूल संदर्भ ही ऐसे प्राधिकरण द्वारा दिया गया हो जो उसे देने में कानूनन अक्षम/अपात्र है, तो श्रम न्यायालय द्वारा दिया गया पूरा निर्णय ही संदेह के घेरे में आ जाता है。

परिच्छेद ९ और १०:
न्यायालय ने पूर्व के ‘समरजीत घोष बनाम बेनेट कोलमैन’ (१९८७) मामले का हवाला दिया। उस मामले में स्पष्ट किया गया था कि धारा १७ की सभी उप-धाराएं मिलकर एक ही संयुक्त योजना (Single Scheme) बनाती हैं। नियमों के अनुसार कर्मचारी जिस कार्यालय में कार्यरत है, उस राज्य की सरकार वह संदर्भ लेबर कोर्ट भेजने में सक्षम होती है और लेबर कोर्ट द्वारा निर्णय दिए जाने के बाद वसूली के लिए उसे फिर से उसी राज्य सरकार के पास भेजा जाता है। संक्षेप में, जिस राज्य के पास वसूली का आवेदन किया जाता है, वही राज्य सरकार इस विवाद को लेबर कोर्ट भेज सकती है。

परिच्छेद ११:
धारा १७ की सभी उप-धाराएं एक ही संयुक्त योजना हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है, और हम आगे स्पष्ट करेंगे कि ‘सिंगल स्कीम’ का क्या अर्थ है। ‘बेनेट कोलमैन’ मामले में न्यायालय ने कहा था कि विवाद को लेबर कोर्ट भेजना राज्य सरकार का काम है। परंतु, उस मामले में राज्य सरकार ने अपने अधिकार किसी अन्य अधीनस्थ अधिकारी को नहीं सौंपे थे, इसलिए उस परिस्थिति के तथ्यों को देखते हुए हमें इस मामले में धारा १७ पर नए सिरे से विचार करना आवश्यक है。

परिच्छेद १२ से १५:
कानून के पूरे ढांचे का मूल्यांकन करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
धारा १७(१) का उपयोग तब होता है जब कर्मचारी मांग करता है और नियोक्ता पैसे देने से इंकार करता है। यहां राज्य सरकार के पास दो विकल्प होते हैं: या तो स्वयं संतुष्ट होना या किसी अन्य प्राधिकरण (Specified Authority) को संतुष्ट होने का अधिकार देना। यदि राशि देय होने पर आम सहमति हो (नियोक्ता को आपत्ति न हो), तो सीधे कलेक्टर के माध्यम से वसूली प्रमाण पत्र दिया जाता है। जबकि धारा १७(२) की भूमिका तब शुरू होती है जब नियोक्ता राशि या दायित्व पर ही आपत्ति उठाता है। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार उस विवाद को निर्णय के लिए श्रम न्यायालय को संदर्भित करती है। धारा १७(३) के अनुसार लेबर कोर्ट अपना निर्णय संदर्भ भेजने वाली राज्य सरकार को सौंपता है और सरकार राजस्व की तरह वसूली के आदेश देती है。

परिच्छेद १६ से १८:
धारा १७ में क्या स्पष्ट लिखा है और क्या मान लिया गया है, यह समझना जरूरी है。 पहली बात, धारा १७(१) के अनुसार कोई भी पुष्टि करने से पहले नियोक्ता को नोटिस देना कानून में स्पष्ट नहीं लिखा होने के बावजूद नैसर्गिक न्याय के अनुसार अनिवार्य है। दूसरी बात, यदि नियोक्ता बकाया को खारिज करता है, तो निर्दिष्ट अधिकारी (Specified Authority) द्वारा प्रमाण पत्र जारी न करके, इसकी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपना निहित माना गया है。

परिच्छेद १९:
तीसरी बात, धारा १७(१) और १७(२) का तुलनात्मक अध्ययन करने पर एक बात प्रमुखता से सामने आती है। विधायिका ने धारा १७(१) में राज्य सरकार को अपने अधिकार किसी अन्य अधिकारी को सौंपने का स्पष्ट अधिकार (Express Power) दिया है। परंतु, धारा १७(२) में अधिकार सौंपने का ऐसा कोई उल्लेख नहीं किया गया है। कानून का सुप्रसिद्ध लैटिन नियम है – ‘Unius est exclusio alterius’ (अर्थात, यदि कानून में एक स्थान पर स्पष्ट उल्लेख हो और दूसरे स्थान पर उसे जानबूझकर छोड़ दिया गया हो, तो इसका अर्थ यह होता है कि दूसरी जगह वह अधिकार नहीं देना था)। इसलिए विधायिका धारा १७(२) के तहत लेबर कोर्ट को संदर्भ भेजने का अधिकार किसी अन्य अधिकारी को देने की छूट राज्य सरकार को नहीं देना चाहती थी, यही निष्कर्ष निकलता है。

परिच्छेद २० से २३:
धारा १७(२) में कहीं भी संदर्भ देने का अधिकार निर्दिष्ट अधिकारी को सौंपने का दूर-दूर तक उल्लेख नहीं है। धारा १७(३) में भी लेबर कोर्ट को निर्णय राज्य सरकार को सौंपने की बात कही गई है, निर्दिष्ट अधिकारी को नहीं। इसलिए कानून के अत्यंत स्पष्ट शब्दों पर विचार करते हुए, राज्य सरकार को धारा १७(१) में अधिकार सौंपने की छूट है, लेकिन धारा १७(२) में अधिकार सौंपने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, यह हम निःसंकोच घोषित करते हैं。

परिच्छेद २४ से ३१:
न्यायालय ने प्रशासनिक कानून (Administrative Law) के मामलों का विस्तृत अध्ययन किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी प्रशासनिक कार्य के लिए अधिकारी केवल जानकारी या साक्ष्य एकत्र करने का काम अधीनस्थ अधिकारी से करा सकते हैं, परंतु अंतिम निर्णय लेने की मुख्य जिम्मेदारी (Ultimate Responsibility) किसी अन्य पर नहीं सौंपी जा सकती। पत्रकारों के वकील ने यह तर्क दिया था कि ‘वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट’ श्रमिकों के कल्याण का कानून होने के कारण इसमें अधिकार सौंपने का अर्थ अंतर्निहित माना जाना चाहिए। परंतु न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि जब कानून की भाषा अत्यंत स्पष्ट होती है, तो उसमें अपनी मर्जी से बदलाव नहीं किया जा सकता। धारा १७(२) के अनुसार केवल और केवल राज्य सरकार ही इस विवाद को लेबर कोर्ट भेज सकती है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना केवल कार्यान्वयन के लिए नहीं थी, बल्कि उसने सीधे अंतिम निर्णय लेने का मुख्य कानूनी अधिकार ही उप आयुक्तों को दे दिया था, जो कानून के दायरे में नहीं आता。

परिच्छेद ३२:
इसलिए हमारा यह दृढ़ मत बन गया है कि महाराष्ट्र सरकार ने धारा १७(२) के तहत लेबर कोर्ट को संदर्भ भेजने का अपना अधिकार निर्दिष्ट अधिकारियों (उप आयुक्तों) को सौंपकर बहुत बड़ी कानूनी भूल (Grave Error) की है। इस मुद्दे पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा ‘अमर उजाला’ मामले में लिया गया विपरीत निर्णय हमें अमान्य है, और हम इस मामले में मुंबई उच्च न्यायालय (नागपूर और औरंगाबाद पीठ) के साथ-साथ पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के निर्णयों पर मुहर (Affirm) लगाते हैं。

परिच्छेद ३३:
उपरोक्त निष्कर्ष के अनुसार, सभी अपीलों को खारिज कर देना ही स्पष्ट निर्णय होता। परंतु, अधिसूचना जारी हुए काफी समय बीत चुका है और उसके बाद कई घटनाक्रम हुए हैं। विशेष रूप से अब ‘वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट’ २१ नवंबर २०२५ से पूरी तरह से निरस्त हो चुका है और भविष्य में इस कानून के तहत नया संदर्भ भेजने का प्रश्न ही नहीं उठेगा। ऐसी स्थिति में पक्षकारों को फिर से ‘शून्य से शुरुआत’ (Back to square one) करने के लिए मजबूर करना हमें न्यायसंगत और उचित नहीं लगता。

परिच्छेद ३४ से ३६:
इस समस्या का समाधान निकालने के लिए हम ‘अनुमोदन/मंजूरी’ (Ratification) के सिद्धांत से मेल खाते सिद्धांत का सहारा ले रहे हैं। उप श्रम आयुक्तों ने जब ये संदर्भ लेबर कोर्ट भेजे थे, तब वे सरकार की अधिसूचना के समर्थन से भेजे थे, इसलिए उन्होंने जानबूझकर अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्य नहीं किया था। मुख्य प्रश्न यह है कि श्रमिकों का बकाया विवाद अस्तित्व में था या नहीं, जिसका संज्ञान लेना राज्य सरकार के लिए कानूनी था。

परिच्छेद ३७:
यह सब ध्यान में रखते हुए हम यह निर्देश देते हैं कि उच्च न्यायालय की नागपुर और औरंगाबाद पीठ के निर्णय के कारण श्रम न्यायालयों से संबंधित या उच्च न्यायालय द्वारा संभाली गई किसी भी प्रक्रिया या मामले का अंत (Termination) नहीं होगा, और लंबित मामले बंद नहीं किए जाएंगे。

परिच्छेद ३८:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद १४२ (Article 142) के तहत हमें प्राप्त विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए हम निम्नलिखित निर्देश देते हैं:
१. महाराष्ट्र सरकार (GoM) संबंधित श्रम विभाग के माध्यम से उन सभी मामलों के संदर्भों (References) की नए सिरे से और स्वतंत्र रूप से समीक्षा (Revisit) करेगी, जो संदर्भ पहले उप श्रम आयुक्तों द्वारा दिए गए थे।
२. पूर्व के अधिकारियों द्वारा लिए गए निर्णयों का कोई प्रभाव रखे बिना, राज्य सरकार प्रत्येक मामले में स्वतंत्र रूप से दस्तावेजों की जांच कर स्वयं का ‘नया संतोष’ (Fresh Satisfaction) दर्ज करेगी कि यह बकाया विवाद लेबर कोर्ट भेजने योग्य है या नहीं।
३. जिन मामलों में राज्य सरकार संतुष्ट होगी, वहां राज्य सरकार अपने अधिकार में नया वैध संदर्भ (Fresh Reference) जारी करेगी।
४. न्यायालय में चल रही प्रक्रिया रद्द किए बिना, वह जिस चरण (Stage) पर रुकी थी, वहीं से सीधे आगे बढ़ाई जाएगी।
५. यदि इस नए संदर्भ के कारण किसी भी पक्ष (कर्मचारी या कंपनी) को नए साक्ष्य (Fresh Evidence) प्रस्तुत करने हों, तो श्रम न्यायालय उन्हें इसका पूरा अवसर देगा Blunt।

परिच्छेद ३९:
जिन मामलों में श्रम न्यायालय ने पहले ही अपने अंतिम आदेश (Awards) पारित कर दिए हैं और वे आदेश वर्तमान में उच्च न्यायालय (High Court) में चुनौती के तहत लंबित हैं, वहां भी राज्य सरकार को यह प्रमाणित करना होगा कि उस विवाद को लेबर कोर्ट भेजना उचित था। यदि सरकार ऐसा प्रमाणित करती है, तो हाई कोर्ट उस लेबर कोर्ट के आदेश की वैधता पर गुण-दोष (Merits) के आधार पर सुनवाई कर सकता है。

परिच्छेद ४०:
परिच्छेद ३ में उल्लिखित जिन रिट याचिकाओं (जिनमें मुख्य अपील के मामले शामिल हैं) का उच्च न्यायालय द्वारा निपटारा कर दिया गया था, उनके संबंध में राज्य सरकार अपनी संतुष्टि (Satisfaction) रिकॉर्ड करेगी। सरकार द्वारा ‘विवाद लेबर कोर्ट भेजने योग्य था’ प्रमाणित किए जाने पर, प्रभावित पत्रकारों को उच्च न्यायालय में जाकर उस पुराने खारिज आदेश को रद्द (Recall) करने और अपने मामले को फिर से बहाल (Restoration) करने के लिए आवेदन करने की पूरी स्वतंत्रता होगी। ऐसा आवेदन प्राप्त होने पर उच्च न्यायालय उन मामलों को फिर से शुरू कर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेगा, इसमें हमें कोई संदेह नहीं है。

परिच्छेद ४१:
जिन मामलों में राज्य सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि यह विवाद लेबर कोर्ट भेजने योग्य नहीं था, तो सरकार ऐसा निर्णय लिखित रूप में संबंधित कर्मचारी को सूचित करेगी। ऐसी स्थिति में, वह कर्मचारी बकाया वसूली के लिए कानून में उपलब्ध अन्य विकल्पों का उपयोग कर सकता है और ऐसी स्थिति में परिसीमा अवधि (Limitation Period) सरकार का यह इंकार प्राप्त होने की तिथि से गिनी जाएगी。

परिच्छेद ४२:
जिन मामलों में लेबर कोर्ट के फैसले पहले ही पूरे हो चुके हैं और नियोक्ताओं (Companies) ने उच्च या सर्वोच्च न्यायालय में उस संदर्भ की वैधता को समय पर चुनौती नहीं दी है, ऐसे पुराने और बंद हो चुके मामलों को फिर से खोलने (Reopen करने) की अनुमति इस निर्णय के कारण नियोक्ताओं को नहीं मिलेगी。

परिच्छेद ४३:
हम यह पूरी तरह से स्पष्ट कर रहे हैं कि हमने किसी भी कर्मचारी की बकाया की मुख्य राशि या गुण-दोष (Merits) पर कोई निर्णय नहीं दिया है। दोनों पक्ष कानून के अनुसार अपने सभी बिंदु संबंधित न्यायालयों के समक्ष रखने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं。

परिच्छेद ४४:
महाराष्ट्र सरकार को यह आदेश प्राप्त होने या संप्रेषित होने से अधिकतम ६ महीने के भीतर (Within 6 Months) सभी मामलों की समीक्षा कर निर्णय लागू करने का निर्देश दिया जाता है। जब तक राज्य सरकार प्रत्येक विवाद पर अपना अंतिम निर्णय नहीं ले लेती और वह निर्णय पक्षकारों तथा श्रम न्यायालय को सूचित नहीं कर देती, तब तक लेबर कोर्ट या हाई कोर्ट में संबंधित लंबित मामलों की आगे की सुनवाई रुकी रहेगी (Stayed रहेगी)。

परिच्छेद ४५:
यदि हाई कोर्ट के पुराने निर्णय का आधार लेकर श्रम न्यायालय ने किसी मामले को बंद (Close) कर दिया हो और उस बंदी को कहीं भी चुनौती नहीं दी गई हो, तब भी यदि राज्य सरकार उस विवाद को लेबर कोर्ट में संदर्भित करती है, तो वह बंद हुआ मामला फिर से सुनवाई के लिए खोला (Reopen किया) जाएगा。

परिच्छेद ४६ और ४७:
उपरोक्त सभी शर्तों और निर्देशों के साथ सभी सिविल अपीलें और संबंधित आवेदन निपटाए जाते हैं。

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